“मैं था…मैं हूं…मैं रहूंगा…”, संघर्ष के सबसे बड़े ‘योद्धा’ की कहानी, पढ़िए इरफान की आखिरी चिट्ठी

दुर्लभ बीमारी न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर से पीङित अभिनेता इरफान खान का जब इलाज चल रहा था तो उन्होंने अपने मन में उमड़ते विचारों को लेकर अपने प्रशंसकों के नाम एक चिट्ठी लिखी थी ।

पंक्तियां हैं–”अभी तक मैं तेज रफ्तार वाली ट्रेन में सफर कर रहा था । मेरे कुछ सपने थे, कुछ प्लान थे, इच्छाएं थीं, लक्ष्य थे । तभी किसी ने मुझे हिलाकर जगा दिया । मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वह टिकट चेकर था । उसने कहा आप नीचे उतर जाइए, आपका स्टेशन आ गया है । मैं कंफ्यूज था । मैंने कहा- नहीं, अभी मेरा स्टेशन नहीं आया है । उसने कहा- नहीं, आपको अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना ही होगा ।”

अधूरा रह गया जिंदगी का सफर

इरफान खान का स्टेशन बहुत जल्द ही आ गया । दो साल पहले टिकट चेकर के दिए आदेश पर अब जाकर वह जबरिया मुम्बई कोकिलाबेन अस्पताल में उतार दिये गए । अब वह हैं भी और नहीं भी हैं । उनकी चिट्ठी की पंक्ति थी – ”जब दर्द बढ़ता है तो कुछ काम नहीं आता । न ही कोई मोटिवेशन काम आता है । बस दर्द ही होता है और वह दर्द ऐसा होता है कि वह थोड़ी ही देर में आपको खुदा से बड़ा लगने लगता है ।”

अब उनका अपना दर्द तो खत्म हो गया न !

बङे कठिन परिश्रम, अनवरत संघर्ष और अलौकिक प्रतिभा के बल पर उन्हें तेज रफ्तार ट्रेन में सफर का मौका मिला था। वो जयपुर से थे। राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से प्रशिक्षण लिया और यहीं की छात्रा सुतापा सिकदर से शादी की । टेलीविजन धारावाहिक चंद्रकांता, चाणक्य, भारत एक खोज जैसे सीरियल से सफर आगे बढ़ाते हुए हिन्दी सिनेमा में कदम रखा।

हौसले से हासिल की मुकाम

नब्बे का दशक था । भूमंडलीकृत हो रहे समाज में सपना बेचने वाले नायकों का जलवा था । इंडियन डायस्पोरा को ध्यान में रखकर मुम्बई के नामचीन निर्माता-निर्देशक के द्वारा फिल्में बनायी जा रही थीं । तिजोरी भरा जा रहा था । इन बङों के बीच इरफान का सख्त चेहरा किसी काम का नहीं था। कोई पैरवीकार भी नहीं था। ‘छोटों’ ने इस हासिए पर पङे आदमी को पहचाना, मौका दिये। सामाजिक प्रतिबद्धता से युक्त ऐसे निर्देशकों की यह मजबूरी भी थी कि वे कम बजट के लिए थियेटर के आदमी को लेकर आगे आएं। आगे की यात्रा ऐसा इतिहास बन जायेगी, उन्होनें इतना शायद ही सोचा होगा ।

दमदार अभिनय से बनाया शानदार मुकाम

हासिल, मकबूल, लाइफ इन मेट्रो, द नेमसेक, वारियर, ए माइटी हार्ट, स्लमडॉग मिलियनेयर, लाइफ ऑफ़ पाई और द अमेजिंग स्पाइडर मैन, इंंग्लिश मीडियम, बिल्लू बारबर, आन, द लंच बाक्स, कारवां, ब्लैकमेल, सात खून माफ, पीकू जैसी बालीवुड-हालीवुड की फिल्मों में काम किया । खिलाङी से डकैत बने नायक की कहानी पर बनी फिल्म पानसिंह तोमर ने इरफान की कलाकारी पर मुहर लगा दी । राष्ट्रपति ने पद्मश्री इरफान को सर्वश्रेष्ठ नायक का सम्मान प्रदान किया । देशी-विदेशी पुरस्कारों की कोई कमी उनके जीवन में नहीं रही ।

बहुत याद आओगे इरफान

इरफान अध्ययनशील जानकार अभिनेताओं की दुर्लभ प्रजाति में शामिल थे । खाली समय में किसी की आलोचना की जगह हमेशा पढते रहते । फिल्मों में अपनी उभरी आंखों से बहुत कुछ कह जाते थे । संवाद अदायगी में उनके बाडी लंगवेज का मिश्रण अद्भुत होता था। मेलोडियस गानों से युक्त दृश्यों में वह नायिका से रुमानी सम्बंध के दृश्यों में किशोरपन का अहसास नहीं करा सकते थे जो चाकलेटी नायकों की पूंजी रही है । पर्दे पर उनका प्रेम व्यस्क ही हो सकता था । नतीजतन शायद ही उन पर फिल्माया गया कोई गीत लोकप्रिय हुआ हो । मनोज वाजपेयी जैसों की तरह वह कला और व्यवसायिक सिनेमा को जोङने की कङी थे । कीच में कमल की तरह…। व्यावसायिक सिनेमा के रथी नायकों ने उनसे फिल्में छीनने की साजिश भी रची । विशुद्ध मसाला फिल्मों में वह कैसा लगते, यह अबूझ रह गया । जो भी हुआ हो, इरफान भारतीय हिन्दी सिनेमा की प्रौढता की ओर बढते कदम के शिल्पकारों में से एक थे ।

53 वर्ष की जीवन यात्रा बहुत कम है । उनका बहुत कुछ श्रेष्ठ, सर्वश्रेष्ठ आना अभी शेष था क्योंकि अपने को दुहराने (टाइप्ड) से वह परहेज करते थे । चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं उनकी पहचान रहीं । जीवन की इस चुनौती से भी वह खूब लङे लेकिन उन्हें हराने की साजिश रचा जा चुका था !! साजिश 29 अप्रैल को सफल हो गया । परिजनों, मित्रों सहित वे प्रशसंक भी मर्माहत हैं जिन्होनें उन्हें न नजदीक से देखा है और न ही उनसे बातें की हैं । जानने वाले कहते हैं कि वह एक बेहतर इंसान भी थे । उन्हें इतना ही करना था । संघर्ष के बीच जीना था । सुख के जब अवसर आये तो कहा गया कि बस हो गया । खुदा ने इतना ही तय कर रखा था कि कम उम्र में असर छोङ कर जाना लेकिन प्रतिभा तो प्यासी रह गई न !!

”..मेरे कुछ सपने थे, कुछ प्लान थे, इच्छाएं थीं, लक्ष्य थे ।”

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