कोरोना से भी बड़ा खतरा: लॉकडाउन मोड में सूरज, क्या पृथ्वी पर आएगी बड़ी आफत ?

धरती पर कोरोना के ख़तरे के बीच आसमान से भी बड़े ख़तरे की आहट सुनाई दे रही है. कोरोना के कारण इस वक्त करीब-करीब पूरी दुनिया लॉकडाउन का सामना कर रही है दुनिया भर के लोग चिंतित हैं कि ये लॉकडाउन कब खत्म होगा, ऐसे में सूरज को लेकर जो खबरें आ रही हैं वो और भी ज्यादा परेशान करने वाली हैं.

सूरज पर भी लॉकडाउन

कोरोना वायरस के कारण अधिकतर देशों में लॉकडाउन से न केवल पर्यावरण को फायदा पहुंचा है, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों का उत्सर्जन भी घटा है। इस बीच सूरज के लॉकडाउन में जाने से अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि सूरज का लॉकडाउन में जाना इंसानों समेत सभी जीवों के लिए गंभीर चिंता का सबब बन सकता है. सूरज के लॉकडाउन में जाने से धरती पर भीषण ठंड, सूखा और भूकंप की संभावना बढ़ जाती है।

सोलर मिनिमम ने बढ़ाया संकट

खबरों के मुताबिक खगोलीय घटनाओं पर नज़र रखने वाले अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने सूरज की सतह पर होने वाली घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से कमी दर्ज की है. वैज्ञानिक भाषा में इसे सोलर मिनिमम कहते हैं. इस दौरान सूर्य पर होने वाली गतिविधियां जबरदस्त तरीके से कम हो जाती हैं, मतलब सूरज लॉकडाउन में चला जाता है.

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वैज्ञानिकों ने क्या कहा ?

सोलर वैज्ञानिकों का कहना है अब हम उस दौर में जा रहे हैं जहां सूरज की किरणों में भयानक मंदी देखने को मिलेगी. ये मंदी रिकॉर्ड स्तर पर होगी जिसमें सनस्पॉट बिल्कुल गायब हो जाएगा. वैज्ञानिकों के मुताबिक सूर्य का मैग्नेटिक फील्ड पहले से काफी कमज़ोर हुआ है. इस मैग्नेटिक फील्ड के कारण ही सूर्य की सहत पर कॉस्मिक रेज होती है और गर्म हवाएँ चलती है. इतना ही नहीं सूर्य की सतह पर सोलर स्पॉट में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है.

वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

कुछ मीडिया रिपोर्टस में द सन के एस्ट्रॉनोमर डॉ टोनी फिलिप के हवाले से कहा गया है कि, हम सोलर मिनिमम की तरफ जा रहे हैं और सनस्पॉट बता रहे हैं कि पिछली सदियों की तुलना में ये दौर ज्यादा गहरा रहने वाला है , लॉकडाउन के कारण सूर्य का मैग्नेटिक फील्ड काफी कमज़ोर पड़ जाएगा और सोलर सिस्टम में ज्यादा कास्मिक रेज आ जाएंगे जो सेहत के काफी खतरनाक है. इसके अलावा इससे पृथ्वी के ऊपरी वातावरण की इलेक्ट्रो केमिस्ट्री पर भी असर होगा, बिजलियां ज्यादा कड़केंगी जिसका सीधा असर मौसम पर होगा.

नासा के वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इससे धरती के मौसम पर गंभीर असर पड़ सकता है। सूरज की किरणों में कमी होने से कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। नासा के वैज्ञानिकों में भी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इससे डाल्टन मिनिमम जैसी घटना फिर से हो सकती है।

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क्या है डाल्टन मिनिमम ?

हम आपको बता दें कि डाल्टन मिनिमम के कारण सन 1790 से 1830 के दौरान 40 सालों तक धरती पर भारी तबाही देखने को मिली थी। इस कारण भयंकर ठंड से यूरोप में कई नदियां जम गईं थीं। किसानों की फसलें खराब हो गई थी। जबकि साल 1816 की जुलाई में यूरोप में भारी बर्फबारी देखने को मिली थी। धरती के कई हिस्सों में ज्वालामुखी का फटना, भूकंप और अकाल जैसे हालात बने थे.

ये है कुदरत का चक्र !

हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इससे ना तो डरने और ना ही घबराने की बात भी कही है, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के वैज्ञानिकों ने कहा है कि इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि सूर्य की सतह पर हर 11 साल में ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं। यह प्रकृति का चक्र है, कुछ दिनों में सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र अपने पुराने रूप में लौट आएगा।

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