प्रवासी मजदूरों के पैदल पलायन से बढ़ी बीजेपी की ‘हार्टबीट’, नाराजगी का असर चुनावी नतीजों पर पड़ने का डर

देश में जारी लॉकडाउन के बीच आजादी के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर एक शहर से दूसरे शहर पलायन की तस्वीरें सामने आ रही हैं, हर रोज हजारों-लाखों मजदूर अपने परिवारों और छोटे बच्चों के साथ सैकडों किलोमीटर दूर पैदल ही पलायन करने को मजबूर हैं. जिनकी किस्मत अच्छी है वो घर तक पहुंच जा रहे हैं जबकि कई लोग रास्ते में ही हादसों का शिकार भी हो रहे हैं. एक अजीब सी स्थिति है कोई कुछ नहीं कर पा रहा है.

मजदूरों की नाराजगी का डर

मजदूरों का माइग्रेशन एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है. मजदूर लाचार हैं, वो दुखी हैं बेबस हैं, गम और गुस्से से भरे हैं यही कारण है कि सरकार भी अब इस मामले पर गंभीर हो चली है. बीजेपी को डर है कि मजदूरों की नाराजगी कहीं चुनावों में अपना असर ना दिखा दे. इसीलिए बीजेपी के बड़े नेताओं ने गुरुवार को अहम मीटिंग की.

जे पी नड्डा के घर मीटिंग

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के घर पर हुई इस मीटिंग में लॉकडाउन के एलान के बाद बीजेपी के बड़े नेता पहली बार मिले. मीटिंग में गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने हिस्‍सा लिया। हालांकि कहने को तो ये मीटिंग कोरोना से उपजे हालात पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। मगर इसमें मुद्दा छाया रहा प्रवासी मजदूरों का।

पार्टी ने मांगे सुझाव

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक बीजेपी अपने नेताओं से यही जानना चाहती थी कि जो हालात अभी बने हैं, उन्‍हें सुधारने के लिए क्‍या किया जा सकता है। बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे रोड पर मौजूद मजदूरों की हर संभव मदद करें। राजनीति के जानकारों की माने तो जिस तरह से मजदूरों का पलायन हो रहा है उससे सरकार किरकिरी हो रही है और बीजेपी को वोटबैंक के खिसकने का डर है.

पीएम ने दिया बड़ा आर्थिक पैकेज

मजदूरों और रेहड़ी वालों की दशा सुधारने के लिए पीएम ने लंबे चौड़े आर्थिक पैकेज का एलान तो किया है लेकिन फिलहाल मजदूरों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने घर लौटने की है और अब तक की तस्वीरों को देखकर ये साफ हो जाता है कि इस काम में सरकारें नाकाम ही साबित हुई हैं. हालांकि पीएम मोदी ने देश के नाम हालिया संबोधन में मजदूरों के कष्ट, तपस्या और त्याग की बात जरुर कही लेकिन वो उनकी घर वापसी को लेकर कोई ठोस प्लान नहीं बता पाए.

मजदूरों पर ब्लेम गेम शुरु

मजदूरों का मुद्दा कितना बड़ा साबित होने जा रहा है उसे इस बात से भी समझिए कि अब इस मामले पर ब्लेम गेम शुरु हो गया है बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस मजदूरों पर राजनीति कर रही है और जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां वो ज्यादा श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन चलाने की इजाजत नहीं दे रही है. बीजेपी नेता संबित पात्रा ने कहा है कि जब यूपी में 400 से ज्यादा और बिहार में 200 से ज्यादा गाड़ियों को इजाजत मिल चुकी है तो पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ में कुछ ही गाड़ियों की इजाजत क्यों नहीं मिली.

चूक गई मोदी सरकार !

प्रवासी मजदूरों पर ये सियासत अभी और ज़ोर पकड़ेगी लेकिन इतना साफ है कि सरकार कहीं ना कहीं हालात को भांपने में नाकाम साबित हुई है क्योंकि 24 मार्च को रात 8 बजे प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन का एलान किया था और महज 4 घंटों के बाद 25 मार्च से ये एलान देशभर में लागू हो गया. दरअसल उस वक्त सरकार को ये अंदाजा ही नहीं था कि मजदूरों के माइग्रेशन की समस्या इतनी बड़ी हो जाएगी कि एक बड़ी आबादी लॉकडाउन के नियम कायदों को तोड़ते हुए सड़कों पर निकल आएगी.

क्या सरकार ने देर कर दी ?

केंद्र सरकार को स्थिति की भयावहता का अंदाजा शायद अप्रैल के आखिरी दिनों में हुआ। तभी तो 1 मई से ‘श्रमिक स्‍पेशल’ ट्रेनें चलाने का फैसला किया गया। मगर प्रवासी मजदूरों की संख्‍या लाखों में थी। आधा मई गुजर चुका है और मजदूर अबतक सड़कों पर हैं। उनके भीतर गुस्‍सा है क्‍योंकि जब उन्‍हें सरकारी मदद की सबसे ज्‍यादा जरूरत है उस वक्त वो ठोकर खाने को मजबूर हैं। बीजेपी भी अब इस बात को महसूस कर रही है। जाहिर है इस मुद्दे पर उसे टेंशन होना लाजिमी है.

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