पहले मांगी दवाई, फिर आंखें दिखाई, कोरोना काल में भारत के खिलाफ अमेरिका में साजिश?

कोरोना संक्रमण से लगातार मौत होने से सुपर पावर अमेरिका की छवि धूमिल हुई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जमकर आलोचना की है। इस बीच कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने कोरोना संक्रमण के लिए बेहद उपयोगी मानी जा रही मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। यूनिवर्सिटी ने  एक स्टडी में दावा किया गया है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन लेने वाले और न लेने वाले मरीजों की स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा, क्योंकि ये दवा गंभीर मरीजों को बचा नहीं पा रही।

रिसर्च में ट्रंप पर भी सवाल

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के इस स्टडी में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सलाह पर भी आपत्ति उठाई गई है जिसमें उन्होंने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया था। अमेरिकी सरकार ने मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली क्लोरोक्वीन को कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों पर  इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी थी।

दो सैंपल सेट पर हुई स्टडी

कोरोना से मौत से बेहाल अमेरिका को इस वक्त कुछ सूझ नहीं रहा है । ऐसे कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन लेने वाले करीब 840 मरीजों के साथ 560 वैसे मरीजों का अध्ययन किया जिसमें हाइडोक्सीक्लोरोक्वीन के बदले दूसरे तरीके और दवा का इस्तेमाल किया गय। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन वाले मरीजों में से कुछ को सिर्फ यही दवा मिली जबकि कुछ मरीजों को एजिथ्रोमाइसिन के साथ मिलाकर दी गई थी। इन दोनों सैंपल सेट्स में अलग-अलग नतीजे आए और  पता चला कि करीब 1400 मरीजों में से 232 की मौत हो गई और 181 लोगों को वेंटिलेटर पर ले जाना पड़ा। दोनों सैंपल सेट्स में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के इस्तेमाल की वजह से न तो मरने का खतरा कम हुआ और न ही वेंटिलेटर पर जाने का चांस कम हो पाया ।

जीवन रक्षक दवा पर सवाल

कोरोना संक्रमण काल में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन एकाएक जीवन रक्षक बनकर उभरी। अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील सब ने पीएम मोदी से दवा की मांग की । भारत ने करीब 82 देशों को  हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की खेप भेजी । इसके लिए भारत ने प्रतिबंध तक हटाएं। अमेरिकी राष्ट्रपति पीएम मोदी की जमकर तारीफ की और सच्चा दोस्त तक करार दे दिया । लेकिन अचानक अमेरिकी रिसर्चर्स की सलाह है कि ये दवा फायदे से ज्यादा नुकसान कर सकती है।

दवा की गुणवत्ता पर सवाल क्यों?

अमेरिकी साइंटिस्ट डॉ. रिक ब्राइट ने बीते दिनों यूएसए के स्पेशल काउंसिल ऑफिस में भारत से पहुंची हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की क्वालिटी पर शिकायत दर्ज कराई थी और ट्रम्प प्रशासन के हेल्थ ऑफिसर पर भारत से मिल रही कम क्वालिटी वाली मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर आगाह किया गया था। जिसके बाद ट्रंप प्रशासन ने डॉ. ब्राइट को सेवा से हटा दिए गए था । ऐसे में दवा की गुणवत्ता पर सवाल साजिश का एक हिस्सा लग रहा है ।

ट्रंप ने खुद दवा लेने की बात कही थी

जब हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की बात चल रही थी तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि वो खुद भी इस दवा को लेंगे । इसके लिए वो अपने डॉक्टर से भी सलाह लेंगे । उस वक्त भारत ने साफ कहा था कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन मलेरिया की दवा है और इसका इस्तेमाल से कोरोना में काफी हद तक फायदा हो रहा है लेकिन दवा लेने से पहले दिल के मरीज अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें ।

ऐसे में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्च में कुछ भी नया नहीं हैं । उसका दवा के बारे संभावित गंभीर दुष्प्रभाव बताना महज छलावा है, जिसमें दिल की धड़कन का अचानक से बेकाबू हो जाना है और ये मौत की वजह बन सकता है । इसे भारत के खिलाफ साजिश माना जाना चाहिए क्योंकि भारत ने पहले ही कह दिया था कि दिल के मरीज इसका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के बाद ही लें ।

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