14 साल में तमंचे से प्यार करने वाले विकास दुबे के आतंकचरित्र की संपूर्ण कहानी

8 दिन बाद आखिर 8 पुलिसवालों के कातिल का फैसला हो ही गया। विकास दुबे एनकाउंटर में ढेर हो गया। आखिर 30 साल में विकास एक विलेन, एक खलनायक, एक गैंगस्टार और एक दुर्दांत अपराधी कैसे बना। जिसकी जिंदगी का फैसला पुलिस की बंदूक से निकली चार बुलेट ने कर दिया।

9वीं क्लास में थामा तमंचा

विकास दुबे एक रात में खौफनाक अपराधी बन गया ऐसा नहीं है। हां ये जरूर था कि गुनाह के अंकुर उसके मन में बचपन में ही फूट चुके थे। विकास की तमंचे से पहली पहचान महज़ 14 साल की उम्र में ही हो चुकी थी। विकास तमंचा कमर में लगाकर हाईस्कूल में पढ़ने जाता था। प्रिंसिपल या टीचर ने क्लास में उसे मारा या डांटा तो स्कूल खत्म होने के बाद वो रास्ते में उन्हे घर कर उन पर हमला कर देता था। स्कूल में विकास साथी छात्रों और टीचर्स पर तमंचे का रौब दिखाता था। छात्रों के साथ छोटी-छोटी बातों पर मारपीट करना और छात्रों को बेरहमी से पीटना विकास का शौक बन चुका था। तमंचे की ये यारी विकास को भारी पड़ी क्योंकि 41 साल बाद तमंचे की दगाबाज़ी ही उसकी मौत का सबब बन गई।

17 साल की उम्र में पहली डकैती

विकास ने तमंचा शौकिया नहीं थामा था और ये बात सारे इलाके को तीन साल बाद ही समझ आ आई। जब 17 साल की उम्र में विकास ने पहली डकैती डाली। सोच कर देखिए विकास दुबे उस वक्त तक कितना खूंखार हो चुका होगा कि उसने बाकायदा एक पूरी बारात को लूट लिया था। उस दौर में भी 17 साल के विकास दुबे के गैंग में ज्यादातर सदस्य बालिग ही थे। विकास की मौत के बाद अब धीरे धीरे लोग हिम्मत कर उसके इताहिस पर बात करने लगे हैं। गांव बिकरू के लोग बताते हैं कि सत्रह साल की उम्र में उसने कानपुर में एक बारात को लूट लिया था जिसमें करीब 100 बाराती मौजूद थे। इस गुनाह से विकास के हाथ पहली बार जुर्म का पैसा लगा और फिर पैसे की यही लत के चलते विकास जुर्म के दलदल में और गहरा पैंवस्त होता चला गया।

18 साल की उम्र में विकास दुबे ने बनाया बुलेट गैंग

बालिग होते ही विकास ने जुर्म की दुनिया पर छा जाने का सपना देखा। वक्त गुज़रने के साथ साथ वो और भी ज्याद खतरनाक होता चला जा रहा था। अब उसे एक गैंग की ज़रूरत थी। अपनी इसी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए विकास ने बुलेट गैंग बनाया। बुलेट बाइक पर खुलेआम असलहा लेकर चलने वाले नौजवानों को विकास दुबे ने अपने साथ जोड़ा जिससे कि इलाके में उसकी दहशत तेज़ी से फैलने लगी। इसके साथ छोटे-मोटे अपराध कर चौबेपुर, शिवली और बिल्हौर में पैर पसारे। प्रयोग कामयाब रहा और विकास मुखिया बन गया। बढ़ती उम्र के साथ साथ जुर्म की दुनिया में विकास के कारनामे भी बढ़ते जा रहे थे। डकैतियां, लूटमार, मारपीट, दादागीरी और ज़मीन पर कब्जे अब विकास दुबे और उसके गैंग का पेशा बन चुके थे।

25 साल की उम्र में विकास ने पहला कत्ल किया

गुनाह के रास्ते पर सरपट दौड़ रहे विकास को अपनी दहशत अब और तेज़ी से फैलानी थी। वो चाहता था कि उसकी दहशत अब आतंक में तब्दील हो जाए। ऐसा करने के लिए ज़रूरी था कि वो कत्ल कर अपने हाथों पर इंसानी लहू रचाए। और उसने ठीक यही किया। विकास दुबे को जानने वाले बताते हैं कि पहला कत्ल उसकी मजबूरी नहीं… ज़रूरत थी। क्योंकि अपने साम्राज्य को बड़ा करने के लिए अब उसे दौलत की ज़रूरत थी। विकास ने कत्ल के लिए झुन्नाबाबा नाम के एक शख्स को चुना। झुन्ना बाबा का कत्ल कर विकास दुबे ने उसकी 18 बीघे ज़मीन और घर पर कब्जा कर लिया। यानी अब उसके पास अपने गिरोह की ज़रूरतें पूरी करने के लिए काफी पैसा आ गया था। धीरे धीरे विकास इलाके के विधायक हरिकिशन श्रीवास्तव के लिए भी काम करने लगा। हरिकिशन का हाथ सिरपर आने के बाद उसने वसूली और जमीन पर कब्जे का काम तेज कर दिया।

35 साल में गैगस्टर की गुरुदक्षिणा

इधर सदी बदल रही थी और उधर विकास के तेवर। विकास के सिर पर अब सियासत का हाथ आ चुका था। इसिलए विकास को अब न कानून का डर था न ही पुलिस का। इसलिए विकास के सपने लगातार बड़े होते जा रहे थे और उसके सपने बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ रहे थे। नई सदी में विकास जुर्म की दुनिया में अपना नया नाम बनाना चाह रहा था। इसीलिए विकास ने वो किया जिसकी कीमत उसे 10 जुलाई को चुकानी पड़ी। ये साल था 2000 का 35 साल की उम्र में विकास ने ताराचंद इंटर कॉलेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या करा दी। इसी साल कानपुर के शिवली थाना क्षेत्र में ही रामबाबू यादव की हत्या हो गई। कत्ल के इस मामले में भी विकास दुबे पर जेल के अंदर रहकर भी साजिश रचने का आरोप लगा।

36 साल की उम्र में विकास का पहला सियासी कत्ल

विकास की पूरी जिंदगी में जुर्म की जिस वारदात ने उसे जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह बना दिया वो उसने साल 2001 में किया था। ये विकास की जिंदगी का पहला सियासी कत्ल था। साल 2001 में कानपुर देहात के शिवली पुलिस स्टेशन के भीतर दिन-दहाड़े भगोड़े गैंगस्टर विकास दुबे ने बीजेपी नेता संतोष शुक्ला की हत्या कर दी इस घटना के चार महीने बाद दुबे ने अदालत में आत्म समर्पण कर दिया लेकिन हत्या के चश्मदीद गवाह 25 पुलिसकर्मी एक के बाद एक अदालत में गवाही देने से मुकर गए। हत्या का जांच अधिकारी भी अदालत में अपने बयान से मुकर गया। इस तरह दुबे को बरी कर दिया गया।

विकास को पब्लिसिटी में रहना काफी पसंद था

विकास जितना खूंखार दुर्दांत था। उतना ही उसे पब्लिसिटी में रहना भी काफी पसंद था। विकास अखबारों में छपी अपने अपराध की खबरों की कटिंग रखता था। विकास को अय्याश जिंदगी जीने का काफी शौक था। इसीलिए बिकरू गांव में उसने अपनी आलीशान कोठी बनाई थी जो किसी किले से कम नहीं थी। विकास दुबे के जिस घर को पुलिस ने खंडहर बना दिया। उस घर में हर वो सुख सविधा थी जो किसी भी आलीशान बंगले में होती है विकास के घर के हर कमरे में एयरकंडीशन लगा हुआ था। घर का बाथरूम भी आलीशान था। गांव में बने इस घर में विकास ने बाथटब तक लगा रखे थे।

गैगस्टर की प्रेम कहानी

5 लाख के इनामी बदमाश विकास दुबे की लव स्टोरी अजब प्रेम की गजब कहानी से कम नहीं। 1995 में विकास दुबे अपराध की दुनिया में एंट्री हो चुकी थी। इसी दौरान विकास दुबे की दोस्ती शास्त्री नगर के मशहूर अपराधी राजू खुल्लर से हुई थी। विकास का राजू खुल्लर के घर आना-जाना शुरू हो गया था। यहीं से विकास की लव स्टोरी की शुरूआत हो गई। राजू खुल्लर की बहन रिचा को विकास दुबे पंसद करने लगा। रिचा और विकास दुबे दोनों एक-दूसरे का पंसद करने लगे। बहन के प्रेम संबंधों की भनक रिचा के भाई राजू खुल्लर को लगी
फिर विकास दुबे उसकी आंखों में खटकने लगा। लेकिन रिचा ने राजू खुल्लर के खिलाफ जाकर विकास से शादी कर ली। दोनों ने अर्जुन पंडित फिल्म आने के बाद शादी की थी।

अर्जुन पंडित से विकास पंडित तक

विकास दुबे को फिल्म का कीड़ा था। बॉलीवुड में गैंगस्टर पर बनी फिल्म हमेशा से विकास की फेवरेट रहती थी। इसी तरह साल 1999 में सनी देओल की फिल्म अर्जुन पंडित रिलीज हुई थी। इस फिल्म में सनी देओल को गैंगस्टर के रोल में दिखाया गया था और विकास के साथी बताते हैं कि ये फिल्म विकास को इतनी पसंद आई थी कि इस फिल्म को विकास ने लगभग 100 बार देखा था। अर्जुन पंडित फिल्म देखने के बाद ही विकास ने अपना नाम बदला था। विकास ने अपने नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया था।

विकास को लगा महाकाल का श्राप

विकास दुबे भगवान शंकर का भक्त था। इसीलिए हर साल सावन के पहले सोमवार को वो उज्जैन में महाकाल के दर्शन को जरूर जाता था। विकास मानता था कि जब तक भगवान महाकाल का वरदान उसके साथ रहेगा तब न तो कोई दुश्मन और न ही किसी दुश्मन की गोली उसका कोई बिगाड़ पाएगी। साल 2 जुलाई को बिकरू गांव में पुलिस और विकास की मुठभेड़ हई। जिसके बाद विकास बिकरू छोड़ कर फरार हो गया। चार दिन बाद ही 6 जुलाई को सावन का पहला सोमवार था। लेकिन विकास फरारी की वजह से इस बार सावन के पहले सोमवार महाकाल के दरबार नहीं पहुंच सका। बाद में विकास की गिरफ्तारी भी महाकाल मंदिर से ही हुई और 10 जुलाई को विकास का एनकाउंटर हो गया।

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