कोरोना के बीच दिल्ली में फूटा ‘महंगाई बम’, शराब के साथ ही केजरीवाल ने बढ़ाए पेट्रोल-डीज़ल के दाम

लॉकडाउन के कारण दिल्ली की हालत खस्ता है, सरकारी खजाना खाली हो चुका है केजरीवाल सरकार के पास कर्मचारियों को तनख्वाह तक देने के लिए पैसे नहीं है ऐसे में दिल्ली सरकार ने अपना खज़ाना भरने की कवायद शुरु कर दी है इसी कड़ी में सरकार ने हर तरह की शराब के दाम 70 प्रतिशत बढ़ाने के साथ ही पेट्रोल-डीजल पर भी वैल्‍यू ऐडेड टैक्‍स यानी वैट को बढ़ा दिया है.

पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़े

केजरीवाल सरकार ने डीजल पर VAT में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी की है। दिल्‍ली में डीजल पर VAT की दर अब 16.75% के बजाय 30% होगी। केजरीवाल सरकार के इस कदम से पेट्रोल के दाम 1.67 रुपये और डीजल के दाम 7.10 रुपये बढ़ गए हैं, डीजल के दाम बढ़ने से माल की ढुलाई का रेट भी बढ़ेगा जिससे महंगाई का बढ़ना भी तय है.

70 फीसदी महंगी शराब

दिल्ली सरकार ने अपने खजाने की सेहत सुधारने के लिए शराब पर भी 70 फीसदी कोविड स्पेशल टैक्स लगा दिया है लेकिन इसके बावजूद शराब के शौकीनों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है अब भी शराब की दुकानों के सामने लंबी लंबी कतारें देखी जा रही हैं. शराब महंगी होने पर भी नशे के शौकीन लोगों का कहना है कि वो सरकार को पैसा डोनेट कर रहे हैं.

लॉकडाउन से खजाना खाली

लॉकडाउन की वजह से दिल्‍ली सरकार का खजाना लगभग खाली हो चुका है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह तुरंत नहीं शुरू हो सकेंगी लिहाजा केजरीवाल सरकार अपने खजाने को भरने के नए तरीके खोज रही है। एडिशनल टैक्‍सेज और सेस के जरिए अपना खर्च चलाने और जरूरी योजनाओं और प्रोजेक्‍ट्स को जारी रखने की कोशिशों पर जोर दिया जा रहा है. दिल्‍ली सरकार ने बजट 2020-21 में GST और VAT, एक्‍साइज, स्‍टैम्‍प ड्यूटी और रजिस्‍ट्रेशन टैक्‍स के जरिए 44,100 करोड़ रुपये राजस्व मिलने का अनुमान लगाया है। लेकिन सरकारी खजाने में अबतक सिर्फ 350 करोड़ रुपये ही आए हैं जो कि अप्रैल 2019 में हुई कमाई का 10% भी नहीं है।

सैलरी का संकट

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अगर ऐसे ही हालात रहे तो सरकार के पास कर्मचारियों की सैलरी देने के लिए भी पैसा नहीं रहेगा। सरकार हर महीने 750 करोड़ रुपये सैलरी के रूप में कर्मचारियों को देती है। इसके अलावा कॉन्‍ट्रेक्‍ट पर रखे गए कर्मचारियों को सैलरी देने में 200 करोड़ खर्च होते हैं। 300 करोड़ रुपये ‘अन्‍य खर्च’ है। इसके अलावा सरकार को अपनी बेसिक मशीनरी चलाने के लिए हर महीने कम से कम 1,100 से 1,200 करोड़ रुपयों की जरूरत होती है। जाहिर है इस वक्त सरकार के सामने मुश्किल हालात हैं जिसका डायरेक्ट असर जनता पर ही पड़ेगा.

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